जरूरी है आत्म ऊर्जा का विस्तार

हर व्यक्ति के भीतर मौलिक रूप से आत्म ऊर्जा विद्यमान रहती है जो उसके अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार न्यूनाधिक स्तर पर बनी रहती है। प्रकृति के पंच तत्वों से निर्मित इस शरीर में आत्म ऊर्जा का स्तर जन्म के समय सभी में समान होता है लेकिन जैसे ही इंसान समझदार होने लगता है तभी से उसके भीतर की आत्म ऊर्जा के स्तर में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है।
मौलिकता और ग्राह्य तत्वों के विशुद्ध होने तथा कर्मयोग एवं शुचितापूर्ण व्यवहार की स्थिति में यह स्तर उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। निरन्तर बढ़ते रहने वाला यही स्तर व्यक्तित्व के विकास और जीवन की आशातीत सफलता में उत्प्रेरक का काम करता है और व्यक्तित्व को निखारता है।
इस अवस्था में इंसान अपने ईच्छित लक्ष्यों, कल्पनाओंं और कामनाओं को मूर्त रूप प्रदान करने में समर्थ हो जाता है और इनसे उसे जीवन और जगत के भोग तो प्राप्त होते ही हैं, आत्म तोष एवं आनंद का भी हर क्षण वह अनुभव करता रहता है।
ऎसे व्यक्तियों के सम्पर्क में जो लोग काम करते हैं, जिन्हें इनका सान्निध्य प्राप्त होता है, वे सारे के सारे जीवात्मा अपने आपको ऊर्जित एवं प्रसन्न महसूस करते हैं और उन्हें इनके सामीप्य में अलग ही आकर्षण और सुकून का अहसास होता है। हमारी आत्म ऊर्जा तभी तक सुरक्षित रहती है कि जब तक हमारे जीवन में शुचिता, सेवा भाव, मैत्री, करुणा, दया और परोपकार जैसे मानवीय मूल्य और संस्कारों का अस्तित्व बना रहे।
जीवन और जगत के प्रति व्यवहार शुचितापूर्ण बना रहे, मन, कर्म और वचन से सत्य का परिपालन होता रहे। ऎसे में आत्म ऊर्जा अपने आप में परमाण्वीय कवच और ब्रह्मास्त्र की तरह कार्य करती है और किसी भी आसन्न खतरे से बचाती है। इस विशुद्धावस्था में रहने वाला व्यक्ति इतना सामथ्र्य पा ही लेता है कि अपने बारे में कहीं भी कोई चर्चा या हलचल होती है तो उसे आभास हो जाता है और उसका आभा मण्डल अपने आप अपनी ओर से संहारक ऊर्जा दाग कर उसे मानसिक धरातल पर ही इस तरह नष्ट कर देता है कि उसे स्थूल रूप प्राप्त हो ही नहीं पाता।
आत्म ऊर्जा का यह परिपक्व एवं पूर्ण भण्डार किसी आयुध भण्डार या परमाणु केन्द्र से कम नहीं होता जहाँ हर तरंग और हर गतिविधि को स्वतः नियंत्रित करने या मोड़ देने की क्षमता स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है। दूसरी अवस्था में आत्म ऊर्जा का स्तर अपवित्रता, मर्यादाहीनता और दुराचारों की स्थिति में पापों की अभिवृद्धि एवं पुण्यों में निरन्तर कमी के चलते लगातार कम होता जाता है और इसका स्थान ले लेती है नकारात्मक ऊर्जा।
ऎसे में संसार की नकारात्मक शक्तियों और आसुरी भावों वी आत्माओं के लिए यह शरीर बेहतर माध्यम के रूप में परिणित हो जाता है जिससे व्यक्ति चाहे-अनचाहे बुरे कर्मों की ओर उद्यत हो जाता है। एक बार दूषित और हराम की कमाई का खान-पान, नशों और बिना मेहनत की कमाई, चोरी, डकैती और लूट , भ्रष्टाचार, व्यभिचार, जीव हिंसा आदि तमाम पापों की शुरूआत हो जाने पर इंसान इन्हीं का अभ्यस्त हो जाता है।
ऎसे में उसके मन-मस्तिष्क में यह बात गहरे तक घुस जाती है कि वो जो कर रहा है, वहीं दुनिया का सच और अत्यावश्यक करणीय कर्म है और इसमें कुछ भी बुरा नहीं। दुर्बुद्धि इंसानों के लिए यही अपने जीवन का संविधान बनकर रह जाता है। ऎसे लोग मोहान्ध, कामान्ध और हर दृष्टि से अंधकार में रमे रहने के कारण जब तक जिन्दा रहते हैं तब तक नर पिशाचों की तरह व्यवहार करते हैं। आसुरी भाव इनके रग-रग में इस कदर व्याप्त हो जाते हैं कि इन्हें न कोई समझा सकता है, न ये समझने को तैयार रहते हैं।
समाज-जीवन, क्षेत्र और समुदाय में ऎसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्हें मनुष्य मानने तक को हमारा दिल नहीं करता। हर क्षेत्र और समुदाय में ऎसे खूब सारे लोग होते हैं जिनके बारे में सभी सज्जन दिल से यह स्वीकारते हैं कि ये ही वे लोग हैं जो समाज, मानवता और देश-दुनिया के दुश्मन हैं और इनका हर कर्म राक्षसी होकर रह गया है।
इन लोगोंं के लिए शेष समुदाय किसी न किसी रूप में अधःपतन और आकस्मिक मरण तक की प्रार्थनाओं में जुटा रहता है। सज्जनों की स्थिति यह है कि वे जब भी कोई श्रेष्ठ कर्म करने को उद्यत होते हैं, ये चिमगादड़ अंधेरा कायम रहे का जयघोष लगाते हुए आ धमकते हैं।
इन नुगरों को कभी भौंकने वाले श्वानों के रूप में देखा जा सकता है, कभी सिंग वाले जानवरों की तरह व्यवहार करते हुए, और कभी कहीं न कहीं कान भरते हुए या आग लगाते हुए। सत् और असत् का संघर्ष धीरे-धीरे परवान पर चढ़ता जा रहा है।
हमारी खूब सारी असफलताओं, बीमारियों और हताशाओं का मूल कारण ऎसे ही लोग हैं जिनमें आत्म ऊर्जा का स्तर बहुत न्यून है अथवा इस दृष्टि से ये लोग खोखले हैं। इनके दिल, दिमाग से लेकर हर अंग-प्रत्यंग में नकारात्मक भावों से भरा खून बहता रहता है और इस कारण से इनका पूरा आभामण्डल कई-कई फीट तक नकारात्मकता से भरा रहता है।
आम तौर पर सकारात्मक भावों से भरे और भरपूर आत्म ऊर्जा वाले लोगों के सम्पर्क में ऎसे नेगेटिव लोग आ ही नहीं पाते। यदि किसी कारण से सम्पर्क हो भी जाए तो किसी न किसी बहाने कोई न कोई सूक्ष्म क्रिया-प्रतिक्रिया ऎसी होती है कि ये रुष्ट होकर अपने आप दूर हो जाते हैं अथवा अच्छे लोग इनके बारे में पहली मुलाकात में ही स्पष्ट समझ बना लिया करते हैं।
फिर भी कई बार ऎसा होता है कि किसी न किसी मजबूरी के चलते आसुरी भावों वाले नाकारा और निगुरे लोगों का सम्पर्क हो ही जाता है तब भद्र लोगों का आभामण्डल कुछ हद तक दूष्प्रभावित और दूषित हो जाता है और इसका खामियाजा सज्जनों को भुगतना एवं भोगना पड़ता है।
इसका कारण यह है कि नकारात्मकता भरे लोग उस डंपिंग यार्ड की तरह हैं जहाँ हर किस्म की दुर्गन्ध के भभके उठेंगे ही उठेंगे। इनसे कोई भी बच नहीं सकता। फिर यह भी शाश्वत सत्य है कि गंदगी की दुर्गन्ध लम्बे समय तक बनी रहती है। ऎसे नकारात्मक लोगों को सीधे-सादे शब्दों में उस कचरा पात्र की तरह मानें जिन्हें कोई भी अपने घर-दुकान या प्रतिष्ठान के पास रखना नहीं चाहता। बल्कि सभी चाहते हैं कि ये कचरा पात्र जितनी हो सके, उतनी दूरी पर ही रहें। हालांकि हर कचरा पात्र यही समझ कर खुश रहता है कि उसे आलीशन भवनों, पार्कों, प्रतिष्ठानों का सामीप्य प्राप्त हो रहा है।
समाज में सभी तरह के लोगों का वजूद रहा है और आगे भी रहेगा। इसलिए उनके संहार या उन्मूलन की बजाय उनसे मुक्ति के लिए समुचित दूरी बनाए रखें ताकि वे अपने व्यक्तित्व को दूषित या दुष्प्रभावित करने का साहस न कर सकें। इनकी निकटता से भी आत्म ऊर्जा का स्तर घटता है और वैचारिक मलीनता के साथ शारीरिक हानि की संभावनाएं हो सकती हैं।
अपनी आत्म ऊर्जा का पूरा-पूरा स्तर बनाए रखने के लिए शुचितापूर्ण जीवन व्यवहार और नैष्ठिक कर्मयोग को अपनाए रखें और नकारात्मक विचारों एवं नकारात्मक, हिंसक एवं अहंकारी लोगों से सायास दूरी बनाते हुए आगे बढ़ते रहें। यह ध्यान रखें कि कचरा पात्र जड़ होते हैं, जहाँ पड़े हैं वहीं पड़े रहने वाले हैं जब तक कि सड़ या खत्म न हो जाएं। हम इंसान हैं और इंसानों का सर्वोपरि एवं चरम लक्ष्य है - चरेवैति-चरेवैति।
