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साहित्य
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वैदिक वनस्पति विज्ञान पर शोध अनुसंधान जरूरी

Deepak Acharya
Deepak Acharya
January 8, 2022

यज्ञों के माध्यम से समष्टि और व्यष्टि के कल्याण की दिशा में महा परिवर्तन लाया जा सकता है। वैदिक वानस्पतिक विज्ञान के रहस्यों के मर्म को आत्मसात करते हुए इनके औषधीय महत्व के व्यापक प्रचार-प्रसार की आज महती आवश्यता है। व्यष्टि और समष्टि के व्यापक हित में इन पुरातन रहस्यों की जानकारी से आम जन को परिचित कराने की दिशा में वैदिक विज्ञान एवं अध्यात्म जगत से जुड़े लोगों को अब आगे आना ही होगा।

वैदिक वांगमय में दिव्य वनौषधियों और वानस्पतिक महत्व पर विस्तृत चर्चा का समावेश है। वनस्पतियां महान चमत्कारिक गुणों व कारगर प्रयासों से परिपूर्ण हैं एवं इनके प्रयोग से अद्भुत परिवर्तन लाना संभव है। वनस्पति समस्त प्रकृति, पशुओं और मानवजाति को पोषण करने वाली है, यह औषधियों के रूप में दुःखदायक रोगों से मुक्त कर दिव्य सेहत प्रदान करने वाली है। वेदों में वनस्पति और औषधियों की महिमा विभिन्न ऋचाओं में वर्णित है। औषधियों के योग्य सेवन से मनुष्य की जीवनी शक्ति बढ़ती है। औषधियों की माता भूमि है, यही औषधियां व्याधियों को हरने वाली हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि वेदों में वर्णित औषधीय विज्ञान के रहस्यों को अनावरित कर इन पर व्यापक शोध अध्ययन एवं अनुसंधान किया जाए ताकि औषधियों का हवन, दवाइयों के रूप में सेवन, नस्य आदि से सेहत रक्षा का संदेश आक्षितिज पसर कर लोक मंगल की नई भाव भूमि की रचना कर सके।

संसार में जो-जो भी वनस्पति है वह उपयोगी है। यह अलग बात है कि हमें इनके उपयोग का पता नहीं है। श्रुति परम्परा से चले आ रहे इस वानस्पतिक ज्ञान को संरक्षण करने के लिए अब भी यदि ठोस प्रयास किए जाएं तो भारतीयों को विदेशी दवाइयों के घातक प्रभावों से मुक्त कराने की दिशा में ठोस पहल हो सकती है।

वनस्पति विज्ञान और भारतीय औषधि विज्ञान की इन परम्पराओं की ओर अभी यदि ध्यान नहीं दिया गया तो विदेशों पर हमारी निर्भरता घातक स्तर तक बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। हजारों-लाखों रुपए खर्च कर जो विदेशी दवाई हमें स्वस्थ होने का आभास मात्र करा सकती है, वह हमारे इर्द-गिर्द जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों के रूप में प्रचुर मात्रा में मौजूद है और बीमारियों का समूल उन्मूलन करने के साथ ही रोगों से मुक्त करा देने तक में सक्षम है।

जिन लोगों के पास यह परम्परागत वानस्पतिक ज्ञान है उन्हें भी चाहिए कि वे दंभ या लोभ, कारोबारी मनोवृत्ति अथवा जड़ ग्रंथियों को समाप्त कर जिज्ञासुओं को इसका ज्ञान दें ताकि ऋषि-मुनियों का यह दिव्य ज्ञान आने वाली पीढ़ियों तक संवहित होता रहे। लेकिन यह सब कोई और करने वाला नहीं है, हमें ही दो-चार कदम तो बढ़ाने ही पड़ेंगे।