सफलता का संकेत है श्रेष्ठ कर्म में बाधाएँ

दुनिया के अधिकांश लोगों के दिमाग में जिन्दगी भर यह प्रश्न कौंधता रहता है कि अच्छे कार्य में जुटते ही बाधाओं का आना आरंभ हो जाता है। सज्जनों को हर क्षण इसका अनुभव होता ही है। और वे इससे दुःखी रहा करते हैं। कोई सा अच्छा काम हो, जैसे ही कोई इसकी शुरूआत करता है, लोग बिना किसी कारण के पीछे पड़ जाते हैं, विरोध और निन्दा शुरू हो जाती है और ऎसे-ऎसे अवसरों से साक्षात होता रहता है कि जिसमें मन खिन्न हो जाता है। कई बार मानसिक के साथ-साथ शारीरिक नुकसान भी भोगना पड़ता है और कई मामलों में श्रेष्ठ कर्म करने वाले, सामुदायिक हितों का चिन्तन करने वाले, निष्काम भाव से समाज, क्षेत्र और देश की सेवा करने वालों को कठिनाइयों भरे दौर से गुजरना पड़ता है। ऎसे में कुछ फीसदी लोग जमाने की प्रदूषित हलचलों की वजह से पलायन कर जाते हैं और यह मान बैठते हैं कि इस दुनिया में दुष्टों और राक्षसों का बाहुल्य होता जा रहा है।
जब भी समाज, क्षेत्र और देश के लिए किसी अच्छे कर्म की नींव पड़ती है, न जाने कहाँ-कहाँ से ऎसे-ऎसे विचित्र लोग सामने आ जाते हैं जिनका हमारी पीढ़ियों और हमसे कोई लेना-देना नहीं होता, न एक-दूसरे को जानते हैं। इन्हें इंसान कहना ही इंसानियत का अपमान है।फिर भी ऎसे लोग हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं। हमारे इन तात्कालिक विरोधियों में भद्र एवं कुलीन लोगों का प्रतिशत नगण्य होता है जबकि उठाईगिरे, अनपढ़, चोर-उचक्के और ऎसे वर्णसंकर सामने आ जाते हैं जिनके जीवन का उद्देश्य ही हराम की कमाई और जबरिया आतिथ्य पाना ही होता है।
इन लोगों को लगता है कि दुनिया उनके लिए ही बनी है इसलिए इनके खान-पान से लेकर तमाम तरह की मुफतिया मौज मस्ती का इंतजाम करना दुनिया के लोगों का काम है। इन तमाम स्थितियों का मूल कारण यह है कि बिना किसी कारण के कोई हमारी निन्दा करे, नुकसान करने पर तुल जाए और हमें शत्रु समझ ले तो उसके दो-तीन ही कारण हो सकते हैं। या तो हमारी पूर्वजन्म की कोई शत्रुता रही हो, या हमने पूर्वजन्म के इन भिखारियों को किसी न किसी तरह भीख या झूठन-खुरचन से वंचित कर दिया हो अथवा ईश्वर ने इनको ठिकाने लगाने के लिए ही हमसे शत्रुता करवा दी हो। इसके अलावा और कोई कारण नहीं हो सकता।
पूर्वजन्म के शत्रु भी हमारे साथ ही हमारे समकालीन युग में ही पैदा होते हैं और लेन-देन या शत्रुता का निर्वाह कर चले जाते हैं। इसलिए जहाँ तक हो सके, इन्हें उपेक्षित करते रहें, इनकी हरकतों को बर्दाश्त करते रहें। लेकिन जब पानी सर से ऊपर आ जाए तो फिर बर्दाश्त करना छोड़कर इनका निर्णायक उन्मूलन करने के कामों में पीछे न रहें।
वर्तमान युग के राक्षसों के लिए यह जरूरी नहीं कि उनके खुर-सिंग हों, अब बिना इनके भी चारों तरफ खूब सारे राक्षस विचरण कर रहे हैं। फिर सच्चे भक्त और धर्म एवं सत्य मार्ग पर चलने वाले लोगों का सबसे बड़ा फर्ज यही है कि इनके संहार में पीछे न रहें क्योंकि ये लोग सज्जनता, श्रेष्ठ कर्मों, रचनात्मक गतिविधियों के ही शत्रु नहीं हैं बल्कि समाज और राष्ट्र के भी शत्रु हैं क्योंकि इनके कारण से देश की कार्यक्षमता और कर्मयोग का ह्रास हो रहा है।
ये पूजा-पाठ, भक्ति और कर्मकाण्ड सारे बाद में हैं, पहले असुरों का संहार। अपने देवी-देवताओं से सीखें और असुरों के संहार के तमाम तरीकों को अपनाएं। भगवान का सच्चा भक्त वही है जो उन सभी कामों में पीछे न रहे, जिनके लिए भगवान ने अवतार लिए हैं। असुरों के लक्षण यही हैं कि औरों के सुख को देखकर दुःखी एवं प्रतिक्रियावादी हो जाएं तथा औरों के दुःखों को देखकर ऎसे प्रसन्न हो जाएं जैसे कि मनमाफिक काम हो गया हो अथवा स्वर्ग का आनंद मिल गया हो।
वरना आज आपाधापी के दौड़ में किसे क्या पड़ी है, किसके लिए एक-दूसरे के पीछे भागें और नकारात्मक प्रदूषण फैलाएं। फिर दुनिया में सभी स्थानों पर आजकल ऎसे लोगों की भरमार है जो विधवाओं की तरह अलाप करते रहते हैं। इनमें से अधिकांश की स्थिति उन वैश्याओं की तरह है जिसके पास आने वाले शताधिक लोगों का राम नाम सत्य हो गया हो और उनके नाम का रो रही हों।
पता नहीं लोगों को क्यों मोह या द्वेष हो जाता है। इससे भी बड़ी बात यह है कि जो लोग सज्जनों और कर्मयोगियों या श्रेष्ठ कामों का विरोध करते हैं उनका अपना कोई चरित्र नहीं होता, सिवाय मांग खाने, हराम की कमाई करने और धौंस जमाने के। इनमें एक भी ऎसा देखने को नहीं मिलेगा, जिसे लोग पसंद करते हों।
जिन्हें कोई घास नहीं डालता, कोई नहीं गाँठता, उनकी मजबूरी होती है हिंसक और क्रूर जानवरों की तरह धींगामस्ती करते हुए अपना वजूद दर्शाना। वरना ऎसा न करें तो ये बेचारे बेमौत मर ही जाएं। इस किस्म के लोग सब जगह सम्मान विद्यमान हैं। दुनिया का शायद ही कोई कोना ऎसा होगा, जहाँ इन नुगरों और नालायकों की मौजूदगी न हो।
हैरत की एक बात और भी है कि अक्सर देखा गया है कि माता-पिता और पुरखे शौर्य-पराक्रम और सज्जनता के कारण जाने जाते रहे हैं मगर उनकी संतति पिशाचों की तरह व्यवहार करती है। यही कारण है कि इन नरपिशाचों से उनके घर वाले तक दुःखी और हैरान रहा करते हैं। न केवल घर वाले बल्कि हर क्षेत्र में खूब सारे लोग इनके लिए रोजाना भगवान से प्रार्थना करते रहते हैं कि जितना जल्दी हो इन्हें धरती से उठा ले। सच्चे मन से की जाने वाली प्रार्थना कई बार जल्दी सुन ली जाती है और कई बार भगवान देर से सुनता है। कारण यह है कि भगवान इन दुष्टात्माओं को एक के बाद एक पाप करने का मौका देता है और फिर इन्हीं पापों के परिणामस्वरूप इनका संहार कर देता है।
लेकिन इन सारी बातों में गूढ़ रहस्य की बात यह है कि जिस अच्छे कर्म या अच्छे व्यक्ति को कोई छोटी-मोटी बाधा आती है, इसका संकेत यह है कि भगवान उन्हें सफलता देने को उद्यत तो है लेकिन इसके पहले उसके जीवन से नकारात्मक प्रभावों को खत्म देना चाहता है। और फिर आशातीत सफलता प्रदान करता है। और हम समझते हैं भगवान कुछ भी सहयोग नहीं कर रहा। धरती का एक भी काम ऎसा नहीं है जो बिना किसी बाधा के पूरा हो गया हो। यहाँ तक कि भगवान के अवतारों के दौरान भी ढेरों बाधाएं आयी, जिनका खात्मा भगवान को करना पड़ा।
जीवन की हर बाधा या राह में आकर टकराते रहने वाले असुर भावी सफलता के पक्के संकेत ही होते हैं लेकिन असुरों का संहार करना हमारे भाग्य में बदा होता है इसलिए वे बिना किसी कारण हमसे टकराते हैं। नरपिशाचों से बेपरवाह रहते हुए श्रेष्ठ कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि अच्छे कार्य करना ही भगवान की प्रसन्नता देता है।
