महामारी एवं रोगों आदि से बचाव के लिए यह करें

हनुमानजी का स्मरण कर निम्न मंत्र को तीन बार बोलकर ही घर से बाहर जाएं, वाहन आरंभ करने तथा किसी भी प्रकार की यात्रा की शुरूआत करने से पहले इस साबर मंत्र को तीन बार बोल लें। इससे दुर्घटनाओं से भी बचाव होता है तथा शरीर की हर प्रकार से रक्षा होती है -
ॐ नमः वज्र का कोठा, जिसमें पिण्ड हमारा पैठा,
ईश्वरी कुंजी ब्रह्म का ताला,
मेरे आठों याम का यति हनुवन्त रखवाला।
जब भी कपड़े पहनें उस समय ध्यान रखें कि नासिका के जिस स्वर से हवा आ-जा रही है उसी तरफ वाले हाथ से कपड़े लेकर - ॐ जीवं रक्ष - मंत्र का तीन बार उच्चारण करते हुए सांस अन्दर खींच लें तथा कपड़े पहने। पहले उस तरफ से कपड़े पहनना आरंभ करें जिस तरफ वाली नासिका से साँस का आवागमन हो रहा है।
यानि की जैसे हमारी बांयी LEFT नाक से साँस आ-जा रही है तो बांये हाथ से कपड़े लें और बांयी तरफ से पहले पहनना शुरू करें। दांयी RIGHT साँस हो तो दांये हाथ से कपड़े लें और दांयी ओर से कपड़े पहनना आरंभ करें। इससे शरीर सुरक्षित रहता है।
दुर्गा सप्तशती में समाहित देव्या कवचम् का सवेरे और रात्रि में एक-एक बार पाठ अवश्य कर लें। इसमें हर अंग-प्रत्यंग की देवी का स्मरण होने से सम्पूर्ण शरीर की रक्षा हो जाती है। जो भी कुछ खान-पान करें उसे अपने ईष्ट मंत्र से अभिमंत्रित कर लें। इससे नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाता है।
दिन में दस-ग्यारह बार अपनी साँस को बदलने का अभ्यास करें जैसे कि नाक के बांये नथुने से साँस आ रही हो तो 5-10 मिनट बांयी करवट लेट जाएं। इससे साँस दाहिनी ओर की नाक से आनी शुरू हो जाएगी। फिर थोड़ी देर बाद दाहिनी ओर लेट जाएं, इससे बांयी ओर से साँस आनी शुरू हो जाएगी। इस प्रकार दिन में साँस बदलने की क्षमता प्राप्त करने का अभ्यास करें। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने के साथ ही यौवन तथा उत्साह भी बना रहता है।
सवेरे-शाम ईष्ट मंत्र का मन ही मन जप करते हुए प्राणायाम करें। पहले फेफड़ों में साँस भरें और ईष्ट मंत्र के यथाशक्ति जप करें। फिर फेफड़ों से सारी हवा को बाहर फेंक कर बाहर ही साँस रोके रखकर ईष्ट मंत्र के यथाशक्ति जप करें। इससे शरीर में सकारात्मक आभा मण्डल को बल मिलता है तथा ईष्ट मंत्र की सिद्धि भी अपेक्षाकृत जल्दी होती है। यदि संभव हो तो रोजाना ॐ नमः शिवाय या महामृत्युन्जय मंत्र की कम से कम एक माला जरूर करने का प्रयास करें। प्रातःकालीन लालिमायुक्त अरुणिम सूर्य भगवान को प्रणाम कर जल से 3 बार अर्घ्य दें और मन ही मन किसी भी सूर्य मंत्र का जप करते हुए सूर्य बिम्ब पर एक-दो मिनट का त्राटक करें।
फुरसत के क्षण बड़े ही अमूल्य होते हैं। उनका उपयोग करना हम सीख जाएं तो हमारा और जगत का कल्याण ही हो जाए। जब भी जीवन में शून्यकाल मिलता है, वह भगवान की कृपा से ही। यह शून्यकाल या प्रतीक्षाकाल साधना, स्वाध्याय और दैवीय ऊर्जाओं के आवाहन और संचय के लिए दिया है, इसे समझें और पूरा उपयोग करें।
