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साहित्य
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पागलों की नई जमात सब तरफ कर रही है कबाड़ा

Deepak Acharya
Deepak Acharya
April 15, 2022

फुरसतिये-फालतू बिगाड़ रहे हैं समाज और देश का गणित

जिन लोगों के पास कोई काम नहीं है या जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है वे सारे के सारे मोबाइल लेकर उन पिस्सुओं की तरह घुसे हुए हैं जो खटिया पर नींद निकाल रहे लोगों का खून चूसते रहते हैं।

कुछ लोग जो मौत का इंतजार कर रहे हैं, उन्हें सुनने वाले, उनसे बतियाने वाले लोग नहीं मिल पाते, इसलिए घर के कोने में खटिया पर पड़े-पड़े ही सोशल मीडिया का भरपूर शोषण करते हुए जमाने भर को अपना पाठक, दर्शक एवं श्रोता मानकर चाहे जो उछालते-उण्डेलते और फेंकते जा रहे हैं।

ये नाकारा और टाईमपास लोग अपना और दूसरों का अमूल्य वक्त बर्बाद करते हुए मानव संसाधन और राष्ट्रीय कार्यक्षमता का कबाड़ा तो कर ही रहे हैं, अपना इहलोक और परलोक भी बिगाड़ रहे हैं। इन्हीं में चोर-डकैत और उचक्कों की भरमार है, जो कि एक ग्रुप से कचरा उठाकर दूसरे ग्रुपों और लोगों के वहां फेंकने के आदी हो गए हैं। ज्यों-ज्यों यह चोरी और आयात-निर्यात बढ़ता जा रहा है, त्यों-त्यों इंसान की ईश्वरप्रदत्त मौलिकताओं का ह्रास होता जा रहा है और आदमी खोखला-पराश्रित होता जा रहा है।

बहुत सारे धार्मिकों के पास मन्दिर जाने की फुरसत नहीं है, भगवान की पूजा-उपासना करने को मन नहीं करता है, वे सारे के सारे भगवान के फोटो डाल डालकर अपने आपको भक्त साबित करने पर तुले हुए हैं। और खूब सारे आत्म उपदेशक बनकर जमाने भर को उपदेश देने में भिड़े हुए हैं। खुद भले ही एक उपदेश न अपना सकें, पर औरों के लिए महान विचारक, चिन्तक और उपदेशक बने हुए हैं।

लगता है कि पागलों की एक नई जमात ही पैदा हो गई है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में इनकी ओर से अपने आपको मानसिक विकलांग अथवा मनोरोगी घोषित करने की मांग उठे और सरकार से इन्हें विकलांग मानकर विकलांग भत्ता दिए जाने की पहल शुरू हो।

कितना अच्छा हो कि हम बाहर ताकने-झाँकने और बाहरियों की जिन्दगी के बारे में चर्चा करने की बजाय अपने आप को देखने की कोशिश करें। जितना अपने भीतर जाएंगे, उतना ही तर जाएंगे।