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साहित्य
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रोचक परम्पराओं से भरी है वागड़ की जन्माष्टमी

Deepak Acharya
Deepak Acharya
August 30, 2021

मोरपंखी रंगों का होता है दर्शन

हर ओर छाया रहता है कान्हा के अवतरण का उल्लास

राजस्थान के दक्षिणांचल वागड़ अंचल में वैष्णव उपासना की अत्यन्त प्राचीन परम्पराओं में श्रद्धा और विश्वास के कई-कई रंग देखने को मिलते हैं। वैष्णव परम्परा के अन्तर्गत साल भर आयोजित होते रहने वाले विभिन्न आयोजनों में इनका सहज ही होने वाला दिग्दर्शन कई मायनों में देश के दूसरे हिस्सों के आयोजनों के मुकाबले विशिष्ट एवं अन्यतम है।

ख़ासकर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर वागड़ अंचल भर में आस्था और विश्वास भरी पुरातन परिपाटियों की मनोहारी झलक उल्लास और श्रद्धा की भगीरथी बहाती रही है।

क्षेत्र भर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर मन्दिरों में रोशनी, सजावट, झाँकियां, झूले और विभिन्न अनुष्ठान आम बात है। संभाग के विभिन्न हिस्सों में इस दिन कई अनूठी परम्पराओं का प्रचलन भी रहा है। ख़ासकर राजस्थान के दक्षिणांचलीय क्षेत्रों में जन्माष्टमी की ये परम्पराएं अपने आप में अलग ही हैं।

पंजरी करती है मौसमी संक्रमण से बचाव

जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के बाद बँटने वाला प्रसाद ‘पंजरी’ सिर्फ प्रसाद ही नहीं वरन मौसम के हिसाब से निर्मित औषधि भी है। जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के बाद संभाग भर में पारम्परिक प्रसाद ‘पंजरी’ बंटती है। प्राचीन मान्यता के अनुसार पंजरी सिर्फ प्रसाद ही नहीं, मौसम के अनुरूप निर्मित औषधि भी है जो वर्षाकाल में होने वाले संक्रमणों से लोगों का बचाव करती है।

ख़ासकर आदिवासी बहुल वागड़ की प्राचीन प्रसाद परम्परा में जन्माष्टमी पर्व का प्रतीक प्रसाद ‘पंजरी’ धनिया, सोंठ, मिश्री, पीपल और नारियल का चूरा मिलाकर बनाई जाती है। लोक मान्यता है कि इसका सेवन करने से मौसमी संक्रमणजनित बीमारियों से बचाव होता है। प्रसाद के रूप में पंजरी के सेवन के उपरान्त दही एवं पंचामृत सेवन भी स्वास्थ्य की दृष्टि से फायदेमंद माना गया है। इसी मान्यता के अनुरूप वागड़ अंचल भर में जन्माष्टमी पर पंजरी का विधान आज भी चला आ रहा है ।

शिव मन्दिरों में भरते हैं कृष्ण जन्माष्टमी के मेले

भगवान श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर न केवल वैष्णव मन्दिरों में बल्कि वागड़ के शिवालयों में भी मेले भरने की परम्परा है। डूंगरपुर जिला मुख्यालय पर गेप सागर के पास अवस्थित प्राचीन वनेश्वर शिवालय में परम्परागत रूप में जन्माष्टमी का मेला भरता है। इसमें हर साल सैकड़ों श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं।

वागड़ की मीरा के रूप में विख्यात भक्तिमती गवरी बाई के डूंगरपुर स्थित मन्दिर में विशेष आयोजन होते हैं। यहाँ झूले लगते हैं और जो भी श्रद्धालु मन्दिर आते हैं वे बड़े ही लाड़-प्यार से भगवान बालमुकुन्द को झूला झुलाकर अपने आपको धन्य मानते हैं। इसी प्रकार खड़गदा के समीप क्षीरेश्वर धाम शिवालय पर जन्माष्टमी पर महा समारोह व मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। सीमलवाड़ा क्षेत्र के खाडिया गांव अन्तर्गत खाण्डेश्वर महादेव पर जन्माष्टमी का मेला भरता है।

एक साथ कई कान्हाओं का जन्म

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आधी रात भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भारतीय संस्कृति की प्राचीन परम्परा में शुमार है लेकिन राजस्थान के धु्रव दक्षिणांचल में मध्यप्रदेश और गुजरात की सरहदों को छू रहे वागड़ अंचल(बांसवाड़ा-डूंगरपुर) में एक धर्मस्थल ऎसा भी है जहाँ एक नहीं कई-कई कान्हाओं का जन्मोत्सव एक साथ मनता है।

धर्म और अध्यात्म की दृष्टि से मशहूर वागड़ अंचल के डूंगरपुर जिला मुख्यालय स्थित कसारा चौक में रामद्वारा मन्दिर है जहाँ जन्माष्टमी महोत्सव के अन्तर्गत कोई दो दर्जन कृष्ण मूर्तियां जन्मोत्सव का आनन्द लेती हैं। जन्माष्टमी की शाम कृष्ण भक्त अपने-अपने घरों में साल भर पूजी जाने वाली कृष्ण मूर्तियों को लेकर रामद्वारा पहुंचते हैं व वहां बड़े झूले पर सभी कृष्ण प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित कर उनके सानिध्य में जन्माष्टमी महोत्सव शुरू होता है।

आधी रात तक क्षेत्र की महिलाओं और पुरुषों तथा बच्चों का जमघट लगा रहता है जो भजन-कीर्तनों में सराबोर रहता है। आधी रात होते ही इन सभी कृष्ण मूर्तियों का जन्मोत्सव होता है। आरती और प्रसाद के बाद सभी श्रद्धालु अपनी प्रतिमाएं साथ लेकर घर लौटते हैं। अर्से से जारी यह परम्परा आज भी बरकरार है।

जुआरियों के लिए महापर्व से कम नहीं है जन्माष्टमी

कोई विश्वास करे या न करे मगर यह सच है कि हर साल जन्माष्टमी की रात डूंगरपुर के लोगों के लिए भाग्य आजमाईश और भविष्य के सुकून को नापने की रात होती है।

पर्वतों और मन्दिरों के नगर डूंगरपुर में जन्माष्टमी की रात उन्मुक्त होकर जुआ खेलने की रात होती है। जाने कितनी पुरानी इस परम्परा में आज भी लोग इस रात अपने घरों में जुआ खेलते हैं और एक ही रात में लाखों के वारे-न्यारे हो जाते हैं ।

शहर में जुआरियों के समूह रात में जहाँ-तहाँ बाजी जमाए अपनी तकदीर आजमाते हैं। कई धन्ना सेठ इस दिन खुलकर जूआ खेलते हैं व करीब-करीब इस दिन के लिए तो डूूंगरपुर में जूए को सामाजिक मान्यता प्राप्त है ही ।

माना जाता है कि इस दिन जुए में जीत से साल भर बरकत रहती है । दिन में शुरू होने वाला यह खेल रात भर चलता है। आधी रात कान्हा के जन्म के वक्त पूर्ण यौवन पर होता है। हालात ये हैं कि पुत्र अपने पिता से जुआ खेलने को धनराशि चाहता है और पिता उल्लास के साथ पुत्र को चार अंकों तक में धनराशि देता है। रात भर जुए का जोर रहता है।

जाने कितने दशकों से डूंगरपुर के लोक जीवन में यह बात समायी हुई है कि जन्माष्टमी की रात उन्मुक्त होकर जूआ खेलना न पाप है न बुराई, बल्कि यह रात भाग्य को आजमाने की रात होती है। इस रात वहाँ जूए का जोर रहता है।

युगों से चली आ रही इस प्राचीन परम्परा में आज भी लोग जन्माष्टमी की रात अपने घरों में जुआ खेलते हैं और एक ही रात में लाखों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। शहर में जुआरियों के समूह रात में जहाँ-तहाँ बाजी जमाए अपनी तकदीर आजमाते हैं।

शहर में कई संभ्रान्त परिवारों के लोग और धन्ना सेठ इस दिन खुलकर जूआ खेलते हैं। इस दिन के लिए तो डूूंगरपुर में जूए को करीब-करीब सामाजिक मान्यता प्राप्त है ही। माना जाता है कि इस दिन जुए में जीत से साल भर बरकत रहती है । परम्परा के अनुसार दिन में शुरू होने वाला जूआ आधी रात कान्हा के जन्म तक चलता रहता है । जो मकान मालिक अपने वहां जूआ खेलने बैठने की सुविधा प्रदान करता है उसके लिए जूए बाज को ‘पेइंग गेस्ट’ के रूप में सुविधा मुहैया कराता है और हर बाजी पर निश्चित प्रतिशत हिस्सा निर्धारित होता है।

इस दिन जो बच्चे जूएबाजों के लिए पान-बीड़ी सिगरेट और अन्य सामग्री आदि लाते हैं उनके लिए हर फेरे पर टिप्स के रूप में राशि दी जाती है। कई बच्चों के लिए जन्माष्टमी साल का खुशनसीब दिन होता है जूए के जरिये सिर्फ वांछित सामग्री लाने के बतौर एक बच्चा औसतन पाँच सौ से हजार रुपए पा लेता है।

जुआ खेलने वालों में बच्चे, युवा, प्रौढ़ और वृद्ध तक शामिल हैं। दिन के उजाले में सफेदपोश और सभ्य कहे जाने वाले लोग भी इस रात कहीं न कहीं जूए की बाजियों में व्यस्त होते हैं। जन्माष्टमी की रात पत्नियां मानसिक रूप से पहले से तैयार रहती हैं कि उनके पति रात को कहीं और होंगे। जन्माष्टमी पर जूए के सर्वाधिक प्रचलन के चलते यहाँ इसे जुआष्टमी के रूप में जानते हैं। जन्माष्टमी को शहर की होटलों, सुनसान इलाकों, वीरान पड़े मन्दिरों और अन्य स्थानों पर ये जूआ जन्माष्टमी पर्व पर प्रभात से लेकर दिन और सारी रात चलता है और ऎसे में यदि अगले दिन अवकाश हो तो जूआवालों की पौ बारह हो जाती है।

हार-जीत का दौर निरन्तर चलता रहता है और पैसे हारने के बावजूद हारा हुआ जुआरी किसी से उधार लेकर या फिर अपनी घड़ी, चैन अंगूठी तक दाँव पर लगा देता है। जूए ने समाज और सम्प्रदाय की सीमाओं को लांघ रखा है और विभिन्न जाति वर्ग और सम्प्रदाय के लोग इस दिन अपना भाग्य आजमाते हैं।

जन्माष्टमी पर जुआ खेलने के आदी लोगों ने इस दिन जूए को लेकर कई तरह की मान्यताओं की आड़ ले रखी है। कुछ लोग महाभारत की द्यूत क्रीड़ा तो कोई बतौर शगुन इसमें हिस्सेदारी जताते रहे हैं। मटका (कल्याण एवं रतन) और जूआ खेलने के शौकीन लोगों के लिए जन्माष्टमी पर्व होली-दीवाली की तरह महा उत्सव होता है जब ये लोग खुलकर सट्टा-जुआ के खेल की परंपरा को आगे बढ़ाकर धन्य होते हैं।

हालांकि शिक्षा और जागरुकता के चलते अब समाज के जिम्मेदार लोगों ने इस दिशा में गंभीरतापूर्वक सोच बनाई है लेकिन इन सबके बावजूद यह बुराई डूँगरपुर में बतौर परम्परा किसी न किसी रूप में अपना वजूद बनाए हुए है।

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