सामाजिक अधःपतन के लिए जिम्मेदार हैं नपुसंकता ग्रस्त ये बहुरुपिए

यह सच है कि कोई सा समाज हो, इसका संगठन बनाए रखना और नेतृत्व करना मुश्किलों से भरा है लेकिन निष्ठा और समर्पण के साथ प्रयास किए जाएं तो यह कार्य कोई मुश्किल नहीं है।
कुछ वर्ष पूर्व तक समाज का संगठन प्रभावी हुआ करता था, सामाजिक अनुशासन सर्वोपरि हुआ करता था और पूरा का पूरा समाज इसका पालन भी करता था। यही कारण था कि सामाजिक अनुशासन के चलते समाज और समाजजन उत्तरोत्तर तरक्की करते रहे और बाहरी फैशन, फिजूलखर्ची और दिखावों के नाम पर अनाप-शनाप खर्च जैसी स्थितियां नहीं थीं।
आज सामाजिक अनुशासन समाप्त प्रायः है और समाज के नेतृत्व इस स्थिति में पहुंच गए हैं जैसे वे किसी स्वयंसेवी संस्था या कामचलाऊ गिरोहबन्दी के पर्याय हों। वो समय अलग था जब हर आदमी समाज के लिए जीता था, समाज के लिए कुछ करने की सोचते हुए अपने समाज को आगे बढ़ाने के लिए चिन्तित रहता था।
अब वो स्थितियां नहीं हैं। हर समाज में मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना जैसे हालात हैं। समाज के जिम्मेदार धनकुबेर हों या बुद्धिजीवी, वे अपने व्यक्तिगत स्वार्थों और अपनी ही अपनी प्रतिष्ठा और झूठी शौहरत को बनाए रखने के चक्कर में सामाजिक संगठनों और कार्यों में कभी आगे नहीं आते।
वहीं दूसरी ओर हर समाज में चन्द वैभवशालियों का कब्जा है अथवा ऐसे लोगों के समूह बन गए हैं जिनका अपना कोई प्रभाव नहीं है अथवा अपने आपको महान और लोकप्रिय होने का भ्रम पाले हुए समाज के ठेकेदार बनकर समाज को हाँकने में लगे हुए हैं।
इन हाँकने वालों के बारे में भी कहा जाता है कि ये खुद कुछ नहीं हैं, इन सभी के अपने-अपने पालनहार, आका, अभयदाता और संरक्षक, गाॅड फाॅदर-गाॅड मदर हैं और उन्हीं के नाम पर पलने वाले ये औरों के पालनहार बने हुए हैं। खूब सारे हैं जो राजनैतिक क्षेत्रों में ब्लाइण्ड फोलोवर के स्वरूप में सर्वस्व समर्पण की भूमिका निभाते-निभाते टैण्ड हाऊस और कैटरर्स हो चुके हैं लेकिन ये अपने प्रभाव का इस्तेमाल समाज के लिए कभी नहीं करते, केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति में ही रमे रहते हैं।
नेतृत्व का कोई माद्दा नहीं होने के बावजूद जब ये सामथ्र्यहीन और दिखाऊ बड़े आदमी अपनी ही तरह के समानधर्मा स्वांगिया झुण्ड में जमा रहते हैं तभी इनमें नेतृत्व क्षमता के भाव जागृत होते हैं। इनमें भी बहुसंख्य ऐसे हैं जो चाहते हैं कि वे ही वे हर जगह छाए रहें, कोई सैकण्ड लाईन या नए लोग कहीं आ ही नहीं पाएं।
इस कारण से एक विशिष्ट किस्म का झुण्ड बन जाता है जो कि गिरोहबन्दी में माहिर होकर हमेशा अपनी ही अपनी चलाता रहता है। और इनके इसी स्वभाव और व्यवहार के कारण से समाज के सज्जन, ऊर्जावान और समझदार लोग आगे आने से कतराते हैं और समाज के लिए कोई योगदान नहीं दे पाते।
समाज के बुजुर्गों, और लगातार पदों पर बैठे रहने के आदी लोगों को चाहिए कि वे संरक्षक या परामर्शक के रूप में अपनी भूमिकाएं तय करें और सक्रिय पदों पर युवाओं तथा ऊर्जावान लोगों को आगे लाएं। कई जगह तो एक ही एक चेहरे सब जगह देखकर लोग कहते रहे हैं कि ये स्पीड ब्रेकर, खोडिबाईये और रोबोट कब तक जीते रहेंगे, लोग समाज, संस्थाओं, संगठन और क्षेत्र के भले के लिए यमराज को रोज इनके लिए न्योता देते रहते हुए सर्वशक्तिमान परमात्मा से सामाजिक कल्याण की मनोकामना करते रहते हैं।
आज हर संस्था, समुदाय, संगठन और समाज या क्षेत्र में चन्द लोग ऐसे हैं जो हर जगह दिख जाते हैं, हर संस्था या संगठन में घुसपैठ बनाए रखते हैं और वर्षों तक पिस्सुओं की तरह घुसे रहते हैं। ऐसे लोग हमेशा अपनी भूतकालीन सेवाओं पर इतराते हुए संगठनों, समाजों और संस्थाओं में बने रहते हैं, पदों पर काबिज रहते हैं, इन पदों का मोह छोड़ नहीं पाते हैं। इस वजह से नए ऊर्जावान और समर्पित लोग आगे नहीं आ पाते हैं।
कई सारे जिम्मेदार और सेवाभावी लोग पलायन कर जाते हैं। आजकल संगठनों, समाजों और संस्थाओं में यह बुराई बड़े पैमाने पर घुसी हुई है। लोग पदों पर बैठ जाते हैं इसके बाद किसी काम में उनकी कोई रुचि नहीं रहती, न आर्थिक योगदान होता है, न शारीरिक श्रम और न संस्था की गतिविधियों में कोई भागीदारी।
इस कारण से संस्थाएं, समाज और संगठन के उद्देश्य पूर्ण नहीं हो पाते और इन पदलोलुपों की की निष्क्रियता के कारण सज्जन, समझदार, समर्पित और सेवाभावी लोग इनसे मुँह मोड़कर पलायन कर जाते हैं। आज भारत में सनातन परम्पराओं के ह्रास के लिए ऐसे ही निकम्मे, चतुर और धूर्त-मक्कार लोग ही जिम्मेदार हैं।
तिस पर भी दुर्भाग्य यह कि ऐसे निकम्मों, शातिरों और षड़यंत्रकारियों को कोई कुछ कहने का साहस नहीं कर पाता। कारण ये कि लोगों में सच बोलने का साहस ही नहीं रहा। रहे भी कैसे झूठन खाने-पीने और हराम का पैसा पाकर अपने आपको महान बताने वालों का स्वाभिमान औंधे मुँह गिरा रहता है। फिर आजकल कोई बुरा बनना नहीं चाहता। अकेले मिलेंगे तो इन नालायकों की सौ से अधिक बुराइयां गिना देंगे, पर सामने कहने में नानी मर जाएगी इन दोगलों की।
जहां जिस संस्था या संगठन का कोई सार्वजनिक कार्यक्रम हो या भीड़ के बीच अपने महानतम एवं लोकप्रिय होने के वजूद का दिग्दर्शन कराना हो, वहाँ जाना और अवसर का पूरा-पूरा लाभ उठाते हुए अवसरों को अपने हक में भुनाने में इनका कोई सानी नहीं।
इस तरह के झुण्ड सभी जगह दिख जाते हैं तब एक के पीछे एक कतार में चलने वाले भोण्डों(सूअरों), भेड़ों की रेवड़ों और श्वानों के पिछलग्गू व्यवहार की याद आ जाती है।
समाज हो या संस्थाएं, बरसों तक एक ही एक प्रकार के चेहरों का झुण्ड मंचों पर छाए रहते हुए सम्मान, अभिनन्दन आदि से पद, मद और कद के प्रति फिक्रमन्द रहता है। इन सामाजिक पोखरों में नए पानी आने के सारे रास्ते बन्द हो जाने की वजह से सडान्ध फैलती रहती है और यह प्रदूषण समाज या संस्था को ले डूबता है।
लेकिन इसकी चिन्ता उन लोगों को कभी नहीं होती, जो समाज को अपनी व्यक्तिगत छवि निर्माण की प्रयोगशाला समझते हैं। हर समझदार इंसान यह महसूस करता है कि मंच, लंच और सम्मान-अभिनन्दन से लेकर पब्लिसिटी के भूखे-प्यासे ऐसे ही रावण, कुंभकर्ण, अहिरावण और पिशाचों के लिए राम ने अवतार लिया था।
कोई सा समाज हो, अभावों और समस्याओं से ग्रस्त लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है और हम उत्सवी मनोरंजन, गोठ, सामूहिक भोजों, शताधिक प्रकारों के व्यंजनों और खान-पान सामग्री के स्वाद भरे आशीर्वाद समारोहों में मजे मार रहे हैं।
ऐसे-ऐसे लोग समाज का नेतृत्व कर रहे हैं, सामाजिक नवनिर्माण की बातें कर रहे हैं जिन्हें अपने घर-परिवार या पड़ोस में कोई नहीं पूछता। अपने माँ-बाप को ये नहीं गांठते, भाई-बहनों से मनमुटाव है, और इनके व्यवहार में न कहीं मानवीय संवेदना होती है न दया, करुणा के भाव। न ये किसी के काम आते हैं। काम भी आएंगे तो कुछ न कुछ रिटर्न लेकर ही। कुल-परम्परा के संस्कारों से विमुख हैं।
खूब सारे जयचन्द देश विरोधी पार्टियों से जुड़े हुए सनातन के विरोध में जुटे रहते हैं। इनके आका राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में जुड़े रहकर समाज और देश को खोखला करने में जुटे हुए हैं और ये लोग इस मामले में चुप्पी साधे रहकर समाज और क्षेत्र को गुमराह करते हैं।
यही नहीं तो ये दोहरे-तहरे चरित्र वाले लोग स्थानीय समाजों और धार्मिक संस्थाओं और आयोजनों में घुसपैठ कर अपने आपको परम धार्मिक और सामाजिक चिन्तक मान बैठे हैं। और समुदाय का दुर्भाग्य यह कि खूब सारे वज्र मूर्ख अपने व्यक्तिगत कामों को निकलवाने, मनचाहे और मनमाने ट्रांसफर-पोस्टिंग करवाने के लिए, अपराधों और अवैध कामों से सुरक्षा कवच पाने या किसी न किसी तरह इनसे याचना करते रहकर कुछ न कुछ पा जाने के चक्कर में अंधानुचर बने हुए अंधानुकरण कर इन्हें भगवान मान बैठे हैं।
आने वाली पीढ़ियां इन्हें उसी तरह माफ नहीं करेंगी, जिस तरह हम इनके पूर्ववर्ती आकाओं के काले कामों को याद करके आज दुःखी और आक्रोशित अनुभव कर रहे हैं।
लगभग प्रत्येक समाज में विधवाओं की स्थिति दयनीय है। वैवाहिक संबंधों में विच्छेद के उदाहरणों की भरमार है। खूब सारी स्त्रियां अकेले में जैसे-तैसे जीवन काट रही हैं, बेरोजगारी का ताण्डव बढ़ता जा रहा है, सामाजिक संस्कार और अनुशासन समाप्त होते जा रहे हैं, कुरीतियों, लेन-देन की ज्वालामुखियां फटने लगी हैं, लोग कपड़े-लत्ते, उपहारों और पराई सामग्री के उपहार लेने में भिखारियों की तरह मानसिकता के साथ भिड़े हुए इसे सामाजिक व्यवहार मान बैठे हैं, विवाहों के आयोजन में एक-दो दिन की चकाचैंध और दिखावों के नाम पर लाखों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है।
समाजजन इस वजह से कर्ज में डूबते जा रहे हैं। जो पैसा समाज, क्षेत्र और देश की सेवाओं और उत्थान में लगना चाहिए, वह केवल दिखावों के नाम पर भेंट चढ़ रहा है। फैशनी दिखावों की दुरावस्था और कुरीतियों में डूबे समाज को उबारने की दिशा में न कोई ठोस निर्णय लिए जा रहे हैं, न इतनी हिम्मत इन नपुंसकों में है।
इन नेतृत्वकर्ताओं का एकमात्र उद्देश्य टाईमपास करते हुए अपने पदों और प्रतिष्ठा को बचाए रखना है, समाज जाए भाड़ में। समाज के धन कुबेरों की भी यह दशा है कि इनमें से उदारता गायब हो चुकी है। समाज के लिए जीने का माद्दा मर चुका है। जैसा समाज वैसा नेतृत्व।
इन तमाम हालातों में जब तक समाजोन्मुखी मानसिकता का जागरण नहीं होगा, अपने आप को आम से ख़ास दर्शाने के लिए बहिर्मुखी प्रोपेगण्डों और आत्मकेन्द्रित इवेंट्स को ही सर्वाेपरि माध्यम माना जाता रहेगा, फोटो, वीडियो और समाचारों में बने रहने का भारी-भरकम मोह बना रहेगा, तब तक सारे उपदेश, उत्सव, मनोरंजनियां कार्यक्रम और बातें बेमानी हैं।
