भरोसे लायक नहीं हैं ये ढोंगी-पाखण्डी

कितना दुर्भाग्य है कि गौसंतों और गौभक्तों को गौवंश तस्करी और गौहत्या पर पाबन्दी के लिए संघर्ष करने को विवश होना पड़ रहा है।
इन्हें सत्ता में बने रहना है, गायों से कोई मतलब नहीं। हम सभी को सोचना होगा कि अपने-अपने क्षेत्रों में ऐसे कितने नेता हैं जो गौवंश तस्करी और गौहत्या पर आवाज उठाते हैं, किसी ने कभी ज्ञापन भी दिया है? विरोध में कभी कुछ किया है?
गौहत्या और गौवंश तस्करी के पाप से ये तथाकथित धर्मान्ध और राष्ट्रवादी भी आशंकाओं के घेरे में हैं। अपनी जिम्मेदारी से ये बच नहीं सकते। लगता है ये गायों और धर्म की बातें ही करने के आदी हैं। असल में इनका गौवंश से कोई लेना-देना नहीं।
मन्दिरों में दर्शन, पूजा-पाठ और अनुष्ठान करने-कराने वाले, धार्मिक आयोजनों में भक्ति का ढोंग-पाखण्ड रचते हुए प्रजा को उल्लू बनाने वाले ये भगवा दुपट्टे और पगड़ियां लपेटने वाले राष्ट्रवादी हैं, जो धर्म के नाम पर अपने आपको धर्माधिकारी और धर्म-कर्म का संरक्षक मानते रहे हैं मगर गौवंश की तस्करी, गौहत्या आदि के निर्णायक समाधान के लिए कभी कुछ नहीं करते।
जहां-जहां इनकी सरकारें हैं वहां ये लोग चाहे जो कर सकते हैं। सख्ती करें तो क्या संभव नहीं। पूर्व सीएम श्रीमती वसुन्धरा राजे जी के समय भी गायों की खूब तस्करी हमने अपनी आँखों के सामने देखी है।
ग्रामीण भीतरी मार्गों से उन दिनों भी बहुत बड़ी संख्या में गायों की तस्करी होती रही। और महारानी जी हजारों की भीड़ में माला जप करती भी देखी गई घोटिया आम्बा के समारोह में।
गायों की तस्करी जहां-जहां से होती है उस रास्ते में पुलिस की कम से कम सौ-सौ चौकियां और थाने आते हैं, गश्ती होती है, कई सारे सरकारी कार्यालय होते हैं, भाजपाइयों का आवागमन भी रहता है और इनके आफिस भी हैं। कौनसी ऐसी मजबूरी है कि इनमें से कहीं भी किसी स्थान पर गायों की तस्करी रोकी नहीं जाती।
तस्कर निर्बाध रूप से गायों की तस्करी करते रहते हैं। भाजपा के राज में गायों की तस्करी और हत्या होना अपने आपमें इन सभी भगवाधारियों, राष्ट्रवादियों और धर्म के नाम पर सत्ता में आए लोगों की नीयत पर संदेह के बादलों की बारिश करते रहते हैं। हर गौभक्त चाहता है कि ये लोग दोहरा-तिहरा और मुखौटा छाप चरित्र छोड़कर अपनी भूमिका सुस्पष्ट करें।
यही स्थिति भागवत की कथा करने वालों और भागवत सुनने वालों से लेकर उनकी भी है जो भागवत कथाओं के नाम पर चन्दा उगाही कर हर साल भागवत की कई-कई कथाओं का आयोजन करते रहते हैं मगर जिस गोपाल के नाम पर भागवत करते हैं उस गोपाल की गायों के लिए कुछ नहीं करते।
यहां तक कि कई मठों, आश्रमों और तरह-तरह के द्वारों के आस-पास भी गायों की दुर्दशा देखती जाती है। इन भागवत कथाओं का कोई प्रभाव नहीं, ये सारी बेमानी हैं।
जब तक अपने क्षेत्र की गायों का पालन, सेवा और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाती, गायों की तस्करी और हत्याएं होती रहती हैं, तब तक भागवत कथाओं और धार्मिक आयोजनों को बन्द कर देना चाहिए।
इन्हें चन्दा देने वालों को भी पाप लगता है क्योंकि सनातन की असली पूंजी गौवंश के प्रति ये सारे के सारे ढोंगी-पाखण्डी उपेक्षा भाव लिए हुए हैं।
इन्हें धर्म के नाम पर सिर्फ धन उगाही, पब्लिसिटी, सम्मान, अभिनन्दन का सुख चाहिए। जब तक सनातन के मूल मर्म को समझा नहीं जाएगा, तब तक सारे धर्म-कर्म और आयोजन बेकार हैं, केवल दिखावा ही हैं।
