हमें अपार गर्व है इन संस्कारी युवाओं पर

कोई सा पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक या सार्वजनिक आयोजन हो, पगड़ी रस्म हो या शुभाशुभ प्रसंगों पर मेल-मिलाप या सामूहिक कार्यक्रम। आजकल यह देखा जा रहा है कि लगभग सभी आयोजनों में घुटनों की समस्या या दुर्घटना की वजह से नीचे जाजम पर बैठ पाने में असमर्थ बुजुर्गों और दिव्यांग की तरह जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए कुर्सियां लगी रहती हैं।
इससे इन विवश लोगों को काफी सुविधा रहती है। लेकिन देखा यह गया है कि बड़े-बड़े आयोजनों में, यहां तक कि पगड़ी रस्म, धार्मिक कार्यक्रमों, बैठकों और सभाओं तक में इन कुर्सियों पर किशोर और युवाओं का आधिपत्य हो जाता है। और इस कारण से कुर्सी पर बैठ पाने में अक्षम लोगों को या तो खड़े रहना पड़ता है अथवा बमुश्किल जाजम पर नीचे बैठना पड़ता है।
इन आयोजनों में कुर्सियों पर पहले से जमा किशोर और युवा तुर्क इस तरह अधिकार करके जमें रहते हैं जैसे कि पूरे कार्यक्रम के लिए टिकट खरीदकर कुर्सी पायी हो। फिर चाहे अपनी उम्र से कितना ही बड़ा बुजुर्ग या कोई मेहमान ही क्यों न आ जाए, ये कुर्सी से हटने का नाम तक नहीं लेते।
इस स्थिति में हमें इन युवाओं पर गर्व और गौरव का अभिमान होना चाहिए कि नहीं? आजकल तकरीबन हर समाज में ऐसे गौरवशाली युवा बड़े पैमाने पर देखे जाते हैं।
इनके साथ ही इनके माता-पिताओं के प्रति भी विनम्रता से सर झुकाकर स्मरण करने का भाव उछाले मारने लगता है, जिनके दिए हुए पावन संस्कारों का दिग्दर्शन पूरी मुखरता से होने लगता है।
तब हमारा दिल अभिभूत हो उठता है इन परम संस्कारी युवाओं को देखकर, जो न केवल अपने-अपने समाजों बल्कि क्षेत्र और देश के सुनहरे भविष्य के रूप में देखे और महसूस किए जाते हैं।
नीचे नहीं बैठ पाने वाले बुजुर्गों और अक्षम लोगों के प्रति इन युवाओं का दृष्टिकोण कितना कल्याणकारी और सेहत का रखवाला है, इसे समझने की कोशिश कोई नहीं करना चाहता।
ये युवा चाहते हैं कि ये बुजुर्ग और दिव्यांग लम्बे समय तक स्वस्थ रहकर घर-परिवार, अपने समाज, समुदाय और क्षेत्र का मार्गदर्शन करते रहें, इसके लिए इन बुजुर्गों को एक जगह बैठे रहने की बजाय टांगों की हलचल हमेशा बनाए रखनी चाहिए, अधिकांश समय अपने घरों में बैठे रहने वाले बुजुर्गों के शरीर हमेशा सक्रिय रहने चाहिएं।
ये अगर कुर्सियों पर बैठ जाएं तो शारीरिक संचालन, एक्यूप्रेशर आदि पर विराम लग जाएगा, जड़ता आ जागएी और ऐसा होने पर इनकी सेहत बिगड़ भी सकती है, और ऐसा ये ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ की महामंगलकारी सोच रखने वाले समाजोन्मुखी, और पुरानी पीढ़ी के कद्रदान भला क्यों चाहेंगे।
फिर इनमें से कई सारे संस्कारी युवा बेरोजगार होते हैं। लगता है इन्होंने कहीं न कहीं से यह सीख लिया है कि सरकारी या गैर सरकारी नौकरी की कुर्सी पानी हो तो जहां मौका मिले, वहां कुर्सी पर जम जाओ। इस टोटके से उन्हें नौकरी-धन्धे वाली कुर्सी मिल ही जाएगी।
इसे कहते हैं पुरानी पीढ़ी का भी भला, और वर्तमान पीढ़ी का भी। आखिर सुनहरा भविष्य मिलने की राह इसी से मिलने में आसानी हो तो इस टोटके को अपनाने में क्या दिक्कत है।
संस्था, समाज हो या समुदाय, इन सभी को चाहिए कि इन संस्कारवान और बुजुर्गों के भविष्य तथा सेहत की इतनी अधिक चिन्ता करने वाले युवाओं को सम्मानित करें, इन्हें इतने अधिक संस्कार देकर व्यक्तित्व विकास करने वाले इनके माता-पिता का भी अभिनंदन करें ताकि इन संस्कारों और मंगलकारी सोच से बचे रह गए दूसरे युवाओं को भी इनसे प्रेरणा मिले और वे भी सामाजिक कल्याण और संस्कार संवहन की मुख्य धारा में आकर अपना, परिवार का, समाज और क्षेत्र का नाम रोशन कर सकें।
