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साहित्य
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सनातन के छछून्दर - बेमानी है शिवलिंग का श्रृंगार

Deepak Acharya
Deepak Acharya
August 5, 2025

परवान पर है मूर्ख शिवभक्तों और पुजारियों का पागलपन

कुछ वर्ष से धर्म का बोलबाला इतना ज्यादा हो गया है कि इसे देख हैरत होती है। कलियुग में धर्म और धर्म के नाम पर होने वाली गतिविधियां महान आश्चर्य से कम नहीं। हर तरफ धर्म के नाम पर कुछ न कुछ हो रहा है, कहीं ज्यादा, कहीं कम। यह धर्म ही है जो लोगों को पाल रहा है, तरक्की दे रहा है और पीढ़ियों को निहाल कर रहा है।

लोगों की एक किस्म ही ऐसी है जो मन्दिरों और धर्म के नाम पर कमा खा रही है। इनके लिए मन्दिर किसी देवी-देवता का श्रद्धा स्थल न होकर छोटी-मोटी शॉप-शॉपी या कियोस्क अथवा फैक्ट्री से कम नहीं है। फिर जितना बड़ा मन्दिर उतना बड़ा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं।

दो-तीन दशकों से धर्म का एक नया ही स्वरूप दिखने में आ रहा है। पहले भगवान की दिव्यता और तेज भक्तों को आकर्षित करता था और मन्दिरों में श्रद्धालुओं का जमघट लगा रहता था। अब मन्दिर सूने हो गए हैं और भगवान को तलाश होने लगी है भक्तों की।

हर मन्दिर का पुजारी और उस मन्दिर के सूत्रधार चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग उनके मन्दिर की ओर आकर्षित हों। इसका यह मतलब नहीं कि भगवान के दरबार में आकर भक्त निहाल हो जाएं बल्कि यह है कि मन्दिर फेमस हो, भक्तों की आवाजाही बढ़े। ऐसा होगा तभी तो चढ़ावा बढ़ेगा, मन्दिर की आवक बढ़ेगी। और जब आवक बढ़ेगी तो मन्दिर में पूजा करने और कराने वाले, मन्दिर की देखरेख करने वाले और मन्दिर प्रबन्धन से जुड़े लोग भी मालामाल होंगे ही। फिर यह ऐसी दुकान है जिसकी पेढ़ी आने वाली कई पीढ़ियों तक चलती रहने वाली है।

इन धंधेबाजों ने धर्म के सारे क्रियाकलापों को अपने-अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए तोड़-मरोड़ कर इतना विकृत कर दिया है कि बस। मन्दिरों के धंधे में दिन दूनी रात चौगुनी आवक बढ़ाने के हर जतन इन दिनों किए जा रहे हैं।

भक्तों को अपने मन्दिर की ओर खींचने की हरचन्द मार्केटिंग हो रही है और तथाकथित धर्म से जुड़े कुनबे का हर शख़्स बिजनैस टैक्ट और लोक लुभावन फण्डों में माहिर हो चला है। खुद भगवान के सामने दो मिनट ध्यान नहीं कर सकते, दो माला नहीं फेर सकते लेकिन मन्दिर के काम में इनका जवाब नहीं।

इन धंधेबाजों ने भक्तों का आकर्षण बढ़ाने में भगवान भोलेनाथ को भी नहीं छोड़ा है। यों देखा जाए तो भगवान भोलेनाथ के मन्दिर हर गांव-ढांणी, कस्बे और शहर में है। ऐसे में शिव के नाम पर धंधे का जोर कुछ ज्यादा ही है।

इन शिवालयों में पिछले कुछ समय से सायंकालीन व रात्रिकालीन श्रृंगार की परम्परा परवान पर है। यों प्रदोष माह में दो बार पड़ता है लेकिन प्रदोष काल रोजाना सूर्यास्त के बाद कुछ समय तक रहता है। इस प्रदोष काल में शिव उपासना का विशेष विधान है। इसी प्रकार तुरीय संध्या में अर्थात अर्द्धरात्रि में भी शिव साधना का विधान रहा है। लेकिन इसे शिव भक्तों की अंध श्रद्धा या भक्तों को अपनी ओर खिंचने की मार्केटिंग कुछ भी कह लें मगर यह सच है कि शिव भक्ति के नाम पर धंधा चलाने वाले लोगों की वजह से शिवजी सायंकालीन पूजा-अर्चना और अभिषेक से वंचित हैं। जिस काल में शिवजी का अभिषेकार्चन और प्रदोषकालीन पूजन होना चाहिए, उस काल में भगवान पूजनीय और अर्चनीय न होकर केवल दर्शनीय ही बने रहते हैं यानि की उनके श्रृंगार का दर्शन करो बस।

यों देखा जाए तो महाशिवरात्रि, श्रावण मास, सोमवार और विशेष अवसरों पर शिवजी की तीनों संध्याओं प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल/प्रदोषकाल में पूजा और अभिषेक का विधान है। कहीं-कहीं विशेष साधनाओं के वक्त तुरीय संध्या अर्ध रात्रि में भी यह सब होता है। लेकिन अधिकांश शिवालयों में पुजारियों, तथाकथित शिवभक्तों और धन्धेबाज धार्मिकों की मनमानी की वजह से शिवजी की सायंकालीन पूजा और अभिषेक नहीं हो पाता है। इनमें वे शिवालय भी शामिल हैं जिन्हें स्वयंभू की मान्यता प्राप्त है।

आम तौर पर सभी शिवालयों में दोपहर तक पूजा होती है और उसके बाद पुजारी या सेवक अथवा भक्तगण शिव मन्दिर के सभी देवी-देवताओं का स्नानाभिषेक कर दो-चार फूल या बिल्व पत्रादि रख देते हैं। मन्दिर में शिवलिंग, पार्वती और नंदी पर चढ़े पुष्पों और फूलमालाओं को कपड़े की पोटली में बांध कर पानी छिड़क कर रख देते हैं।

शिव के निर्माल्य माने जाने वाले इन्हीं पुष्पों का उपयोग शाम को शिवलिंग, पार्वती आदि के श्रृंगार में कर दिया जाता है। एक बार शिवलिंग या किसी भी देवी-देवता पर चढ़ चुके पुष्प आदि सामग्री निर्माल्य की श्रेणी में आती है और निर्माल्य का जल में विसर्जन करना जरूरी है। लेकिन अधिकांश मन्दिरों में ऐसा नहीं हो पाता और सवेरे के फूल तथा मालाएं शाम को शिवलिंग, पार्वती आदि के श्रृंगार में काम में ली जाती हैं।

इन मन्दिरों में सायंकालीन दर्शन के वक्त पुराने फूल मुरझायी हुई स्थिति में साफ देखे जा सकते हैं। भगवान पर यह निर्माल्य चढ़ाने वाला तो अनिष्ट का भागी बनता ही है, वे लोग भी इस पाप के कारण अनिष्ट भोगते हैं जो मन्दिर की देखरेख या प्रबन्ध करते हैं।

इसके साथ ही श्रावण मास, सोमवार, शिवरात्रि हो या अन्य अवसर। रोजाना शिवालयों में शाम के वक्त सवेरे के फूलों व निर्माल्य के साथ ही वस्त्रों व अन्य उपचारों से श्रृंगार कर दिया जाता है। एक बार श्रृंगार हो चुकने के बाद श्रृंगार बिगड़ जाने के भय से शिवलिंग पर शाम हो या प्रदोषकाल हो या रात का समय, कोई भी शिवभक्त चाहते हुए भी अभिषेक नहीं कर सकता।

पुजारियों और धंधेबाज मन्दिर वालों की अधर्मी गतिविधियों का ही परिणाम है कि कुछ को छोड़कर वागड़ अंचल के तमाम शिवालयों में प्रदोष काल की पूजा नहीं हो पा रही है। यही स्थिति श्रावण मास और बड़े प्रदोष के समय होती है।

प्रदोष काल शिवजी के पूजन-अभिषेक के लिए विहित माना गया है लेकिन इस समय भी शिवलिंग का इतना श्रृंगार कर दिया जाता है कि अभिषेक संभव ही नहीं हो पाता। शाम से लेकर रात्रि पूजा तक शिव अभिषेक से वंचित रहते हैं। जलाभिषेक नहीं हो पाने से अग्नि प्रधानता रहती है और इसी कारण जनजीवन में नकारात्मकता हावी है, पर्याप्त और समय पर बारिश नहीं होती और कई प्राकृतिक विपदाओं का सामना करना पड़ रहा है।

यह सारा पाप-दोष उन पुजारियों और सेवकों के साथ ही उन पण्डितों के खाते में भी अंकित होता है जिनके मौन समर्थन से शिवजी अभिषेक और प्रदोषकालीन पूजा से वंचित रहते हैं। यही कारण है कि ऐसे पण्डितों, पुजारियों और भक्तों या सेवकों द्वारा शिवजी को मनाये जाने के लाख प्रयत्न किए जाएं, शिवजी इनसे सदैव रुष्ट ही रहते हैं और इनकी कोई मनोकामना कभी पूर्ण नहीं हो पाती।

शिवभक्ति और उपासना-अनुष्ठान के लिए शैव शास्त्रों का अनुसरण किया जाना चाहिए और इसके लिए जरूरी है भक्तों और रुपए-पैसों के मोह को सामने रखकर की जाने वाली भक्ति का ढोंग बंद हो और वही काम किए जाएं जो शास्त्र सम्मत हैं।

शिवलिंग के बारे में शास्त्रीय परम्परा यही है कि सायंकाल अभिषेक के बाद भस्म और बिल्व पत्र, ताजे पुष्प चढ़ा दिए जाते हैं। इसके बाद भी यदि कोई भक्त शिवजी का पूजन-अभिषेक करना चाहे तो वह कर सकता है।

प्रदोष काल में शिवजी के पूजन और अभिषेक का विधान है भी। इसे देखते हुए सभी शिवालयों में शिवलिंग का श्रृंगार बन्द होना चाहिए। इस तथ्य को भी अच्छी तरह समझना चाहिए कि शिवलिंग भगवान भोलेनाथ के प्रतीक रूप में चिह्न है, और इस पर किसी भी प्रकार का कोई श्रृंगार नहीं हो सकता।

श्रृंगार केवल मूर्तियों का ही हो सकता है, शिवलिंग का नहीं। बावजूद इसके अधर्माचरण करते हुए शिवलिंग का श्रृंगार ऐसी-ऐसी सामग्री से किया जाने लगा है जो अपवित्र और त्याज्य की श्रेणी में आते हैं। यही नहीं तो शिवलिंग का बदल-बदल कर श्रृंगार इस तरह किया जाता है जैसे कि किसी परिसर या व्यक्ति को सजाया जा रहा हो।

कई बार तो इस श्रृंगार को देखकर समझ में नहीं आता कि हँसें या रोयें। पूजा-अर्चना और अभिषेक के बिना शिवलिंग की प्राण ऊर्जा का उत्तरोत्तर क्षरण हो रहा है और इनका प्रभाव तथा क्षमता का ह्रास होने लगा है। यही सब चलता रहा तो श्रृंगार प्रधान सारे शिवालय दिव्य और दैवीय ऊर्जा खोकर एक दिन केवल दर्शनीय होकर रह जाएंगे और पुरातात्विक धरोहर में शामिल हो जाएंगे।