साहित्यिक यात्रा में वापस
साहित्य
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संस्मरण (अतीत के झरोखे से) - नेकी कर दरिया में डाल

Deepak Acharya
Deepak Acharya
March 20, 2022

इस घटना का पूरा ताना-बाना वागड़ से ही संबंधित है। घटना है पूरी सोलह आने सच। बात आज से करीब 20-22 साल वर्ष पुरानी है।

अपने गुरुजी ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल जी के साथ मेरा प्रगाढ़ संबंध रहा है। एक दिन वे अपने नए-नए शिष्य बने एक अधिकारी महोदय के राजकीय आवास पर ले साथ गए। वे अभियांत्रिकी सेवा से जुड़े किन्तु एक बड़े सरकारी महकमे में प्रशासनिक पद पर थे। धर्म-कर्म और आध्यात्मिक चर्चाओं में लम्बा समय बीत गया।

उन्हीं अधिकारी का एक मातहत और विश्वस्त कर्मचारी भी पास ही बैठा चर्चाओं में पूरी रुचि के साथ रस ले रहा था। उसकी नज़र मेरे हाथ में थामे एक ग्रंथ की ओर गई। यह ग्रंथ फलाहारी महाराज द्वारा रचित है जिसका नाम है - स्वधर्म सर्वस्व। उस विप्रवर कार्मिक ने देखने के लिए मुझसे यह किताब ली और यह कहकर अपने पास रख ली कि कुछ दिन पढ़ कर लौटा दूंगा। इस बीच मेरा भी अन्य जिले में तबादला हो गया। वे अधिकारी भी रिटायर्ड हो गए और वह कार्मिक भी किसी और जिले में चला गया और वहाँ सरकारी नौकरी छोड़कर वकालात में रम गया।

कुछ साल बाद मुझे किसी संदर्भ को देखने इस पुस्तक की जरूरत पड़ी। मैंने उन वकील साहब के जिले में रहने वाले एक मित्र को फोन किया और कहा कि उच्च वर्ण के अमुक महाशय से कहना कि पुस्तक की आवश्यकता है इसलिए लौटा दें। मेरे आत्मीय पारिवारिक मित्र ने उनसे सम्पर्क किया और किताब लौटाने के लिए कहा। तब उन महाशय ने जो जवाब दिया वह इतना हैरत भरा रहा कि लगा जैसे इंसानियत का गला घोंट दिया हो।

उन महाशय ने कहा कि किताब तो मैं लौटा सकता हूं लेकिन शर्त यही है कि पढ़ने के बाद मुझे वापस लौटा दें, बहुत अच्छी किताब है, ऎसी दुर्लभ पुस्तक मैंने आज तक नहीं देखी।

किताब मैंने खरीदी, केवल कुछ दिन पढ़ने के लिए दी और वापस चाहे जाने पर बेतुकी शर्त। इस शर्त को स्वीकार नहीं करने का खामियाजा आज तक भुगत रहा हूं। हमेशा मलाल रहेगा इस पुस्तक के नहीं पढ़ पाने का।

शायद इसीलिए यह गीत गुनगुनाया जाता है - देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान। कितना बदल गया इंसान। शर्म भी नहीं आती ऎसे लोगों को। आप ही बताइयें इन्हें क्या कहें। अब वह पुस्तक कहीं उपलब्ध भी नहीं है कि जिससे दुबारा खरीदी जा सके। जिन्होंने लिखी वे भी ब्रह्मलीन हो गए हैं।