सफल जीवनयापन के लिए इन्हें आजमाएँ

भारतीय संस्कृति और परम्पराएं वैज्ञानिकता की कसौटी पर पूरी तरह परखी हुई और सदियों से अनुभूत हैं। इनका आश्रय प्राप्त कर हर कोई मनुष्य सफल जीवनयापन करने के साथ ही कई दिव्य अनुभूतियों से साक्षात् करने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है।
हमारा दुर्भाग्य यह है कि पाश्चात्यों के अंधानुकरण के वर्तमान दौर में हम प्राचीन भारतीय संस्कृति और परम्पराओं से विमुख होते जा रहे हैं और इस वजह से कई समस्याओं और रोगों के सहज निदान से दूर होकर जीवन के स्वर्गीय आनंद को भुला बैठे हैं।
पुरानी पीढ़ी के लोगों को तो हमारी संस्कृति की विलक्षणताओं का परिचय है लेकिन नई पीढ़ी हमारे गौरवशाली इतिहास और संस्कृति तथा ज्ञानराशि के महत्त्व से बिल्कुल परिचित नहीं है। इसी विडम्बना का परिणाम है कि हमारा पूरा जीवन समस्याओं से घिरता जा रहा है और निदान दूर-दूर तक नज़र नहीं आता अथवा कष्टसाध्य, श्रम साध्य और आर्थिक रूप से कष्टप्रद साबित होता जा रहा है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवनपद्धति को सहज, सरल एवं आनन्ददायी बनाने के लिए खूब सारे अनुभूत एवं सौ फीसदी कारगर नुस्खों, उपायों एवं प्रयोगों भरी जीवन निर्वाह पद्धति की बेहतर एवं स्वीकार्य परम्परा का वर्णन किया है जिनका अवलम्बन हर आदमी को सुखी जीवन की डगर दे सकता है। यहाँ ऎसी ही कुछ उपयोगी जानकारी दी जा रही है।
प्रातःकाल बिना किसी से बोले निम्न मंत्र का मात्र तीन बार जप कर लें तो जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन अपने आप दिखेगा। इससे स्मरण शक्ति बढ़ने के साथ ही सदैव तर्क में विजय होगी और हमारा एक-एक शब्द जबर्दस्त रूप से प्रभावशाली होगा।
शर्त यह है कि बिस्तर से उठते ही मुख से सबसे पहले इसी मंत्र का तीन बार उच्चारण करना जरूरी है। अर्थात जगने के बाद यदि मुँह से कोई शब्द निकलेगा तो यही मंत्र निकलेगा। वाणी का माधुर्य चाहने वालों और विद्यार्थियों के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है। कवियों, लेखकों और साहित्यकारों के लिए यह मंत्र विलक्षण बुद्धि भी प्रदान करता है और उनका लेखन अक्षयकीर्ति प्राप्त करता है।
इस मंत्र का प्रभाव सप्ताह भर में दिखना आरंभ हो जाता है। इससे प्रभाव से व्यक्ति प्रत्युत्पन्नमति सम्पन्न हो जाता है। अभिव्यक्ति कला, कविता, साहित्य लेखन और तर्क क्षमता में प्रवीण हो जाता है। विद्यार्थी इसका प्रयोग करें तो उनकी स्मरण शक्ति एवं बौद्धिक ग्राह्यता क्षमता में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ोतरी होती है।
ॐ मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत् क्रौञ्चमिथुनादेवकमवधीः काममोहितम्॥
(श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण, बालकाण्ड द्वितीयः सर्गः 15 वां श्लोक)
विद्या-बुद्धि और स्मरण शक्ति के लिए सरस्वती के बीज मंत्र ‘ ॐ ऎं नमः’ का जप करें। जब भी फुरसत में हों, इस मंत्र का जप करें। सवा लाख से ज्यादा जप हो जाने पर इसका फायदा अपने आप अनुभव होने लगेगा।
रोजगार प्राप्त करना हो, श्रेष्ठ पति की कामना, घर-गृहस्थी के संचालन में आ रही दिक्कतों को दूर करना हो या पितरों की शांति करनी हो तो कच्चा दूध एवं शुद्ध जल पीपल के वृक्ष की परिक्रमा करते हुए नियमित डालें और इस मंत्र का जप करते रहें - ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ग्रह-नक्षत्र खराब चल रहे हों तो सामग्री पशु-पक्षियों को दाना-पानी डालकर पुण्य पाएं।
घर में प्रभावी सकारात्मक वातावरण बनाए रखने के लिए तुलसी के पौधे लगाएं और रोजाना उन पर ध्यान केन्दि्रत करते हुए अपने ईष्ट देव का स्मरण करें।
शरीर और मन भारी-भारी लग रहा हो तो सवेरे जल्दी गौमूत्र का पान करें। ध्यान रखें कि गौमूत्र से बढ़कर चित्त, मस्तिष्क और शरीर की शुद्धि का और कोई दूसरा उपाय नहीं है।
रोजाना जब भी फुरसत में हों, दोनों आँखों की भौहों के बीच में ‘‘ऊँ ’’ या अपने ईष्ट मंत्र का मन ही मन जप करते हुए ध्यान करें। ध्यान में यह भावना करें कि कोई प्रकाश पुञ्ज भीतर छिपा हुआ है और उसकी तरफ आगे बढ़ना है और उसी में भगवान बिराजे हुए हैं। गहरे ध्यान के लिए एकान्त में सहज अवस्था में बैठकर दोनों कानों में अंगुली डाल कर भीतर से आ रही आवाज (नाद) को सुनते हुए उसी में एकाग्र हो जाएं। अवर्णनीय आनंद की प्राप्ति होगी और मस्ती छा जाएगी।
सुखपूर्वक और बाधा रहित नींद के लिए रात्रि को शयन से पहले निम्न मंत्र तीन बार बोल लें-
अगस्तिर्माधवश्चैव मुचुकुन्दो महाबलः ।
कपिलोमुनिरास्तीक पञ्चैते सुखशायिनः॥
जीवन में परमात्मा के सिवाय किसी से भय नहीें रखें क्योंकि जिससे हम काल्पनिक भय रखते हैं वह परमात्मा की इच्छा के बगैर हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह भी एक मामूली इंसान ही तो है। इसी प्रकार किसी दूसरे से कोई अपेक्षा न रखें। भगवान की प्रसन्नता के तीन आरंभिक संकेत हैं - निरपेक्षता, निर्भयता और मुदिता।
जीवन में आने वाले समय, अपने भविष्य या कल को लेकर किसी भी प्रकार की आशंका या शंका न रखें, नब्बे फीसदी से अधिक आशंकाओं का कोई अस्तित्व नहीं होता। वे सिर्फ अपने मन का वहम ही होती हैं जो हमेशा निराधार सिद्ध होती हैं।
अपने रोगों, कष्टों, अभावों और समस्याओं के निराकरण के लिए स्वयं प्रयास करें, जीवन में मन-वचन और कर्म से पवित्रता लाएं, अपने ईष्ट का स्मरण करते हुए साधना बढ़ाएं और जो कुछ चाहिए, उसे अपने ईष्ट के सामने ही निवेदन करें।
सांई, बाबाओं, मांत्रिकों, भौंपों-भौंपियों, तांत्रिकों, टोने-टोटकों, मजारों आदि के प्रपंचों में कभी न पड़ें, इनका काम हमारी दुर्बल मनोदशा का फायदा उठाकर पैसा ऎंठना और मूर्ख बनाना ही है। धर्म-कर्म में जहाँ पैसा, उपहार, वस्तु या व्यक्ति से संबंधित आनंद आ जाता है, वहां न कोई मंत्र काम करता है, न तंत्र या दूआएं।
खूब सारे लोग मामूली भूत-प्रेतों को अपने वश में करके हमारे भूतकाल की घटनाओं को बता देते हैं और हम मूर्ख लोग उनसे प्रभावित होकर धन लुटाने लगते हैं। जरा उनसे भविष्य के बारे में भी पूछ कर देखें, फुस्स हो जाएंगे। इसलिए इन चक्करों में न पड़ें।
अपना ईष्ट बल मजबूत होने पर कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अपनी सात्विक उपासना सर्वाधिक प्रभावशाली है। अपने पूर्वजों की उपासना परंपरा को अपनाएं, इससे हमें जल्दी सफलता प्राप्त होती है। इससे कुल परम्परा की साधना और हमारी साधना के बीच परमाण्वीय ऊर्जा का अदृश्य संबंध जुड़ जाता है और हमें आधी से अधिक सफलता अपने आप प्राप्त होने लगती है।
चोरों का भय हो तो रात को सोने से पहले अथवा कहीं बाहर जाने से पहले घर के मुख्य द्वार को बन्द करते वक्त तीन बार यह मंत्र बोल लें -
कफल्ले कफल्ले दाहिनी मोहिनी सती।
साँप का भय हो तो तीन बार ‘‘ आस्तीक ’’ बोल कर ताली बजा दें। इससे कैसा भी जहरीला सर्प होगा, स्थान छोड़कर भाग जाएगा और आयन्दा साँप का खतरा नहीं रहेगा। यही कारण है कि आज भी कई ग्रामीण इलाकों में साँप से बचने के लिए दीवारों पर आस्तीक लिखा होता है।
स्वास्थ्य चर्चा
सवेरे उठने के बाद आधा से एक लीटर गुनगुना पानी पीएं। जब भी लघुशंका या शौच के लिए जाएं, दाँत भींचकर रखें, इससे दाँत मजबूत रहते हैं। स्नान की शुरूआत दाँये कंधे पर ठण्डा पानी डालकर करें। इसके बाद सर पर पानी डालें फिर पूर्ण स्नान करें। लघुशंका और दीर्घशंका करने से पूर्व हमेशा भरपेट पानी पी लें।
भोजन करने से पूर्व हाथ-पाँव आदि पानी से धो लें और गीले पाँव ही आसन पर बैठकर भोजन करें, इससे डायबिटीज नहीं होता। जब भी पाँवों को धोएं, उसी समय पहले अपनी आँखों पर पानी लगा लें, इससे पाँवों की गर्मी आँखों तक नहीं पहुँचती और आँखें लाल होने की समस्या नहीं रहती।
भोजन करने से पहले गाय और कुत्ते को रोटी खिलाएं। पक्षियों के लिए रोजाना दाना-पानी का माकूल बन्दोबस्त करें।
खाने-पीने का कोई काम खड़े-खड़े न करें बल्कि बैठकर करें। इससे घुटनों का दर्द कभी नहीं सताएगा। भोजन के तत्काल बाद पेशाब कर लें,फिर सौ कदम चल लें। इससे पेट के रोग नहीं होते।
भोजन के बाद थोड़ी सी देर बाँयी करवट लेट लें, इससे दाहिनी नाक से हवा आनी-जानी शुरू हो जाएगी। याद रखें कि भोजन का पाचन तभी शुरू होगा जब दाहिनी नाक से हवा का प्रवाह शुरू हो। ऎसा नहीं होने पर अपच और गैस की शिकायत हो सकती है।
पेट में गैस बनने की समस्या होने पर सर पर थोड़े से दबाव से कंघी फिरायें।
आँखों का तेज बढ़ाने, सभी लोगों का प्रिय बनने और जीवन भर तेजस्वी तथा निरोगी रहने के लिए भगवान भास्कर की उपासना करें और सूर्य को नित्य जल चढ़ाएं। कभी भी सूर्य के सामने खड़े होकर लघुशंका न करें, इससे सफेद दाग और कोढ़ हो सकता है। सूर्य भगवान को श्रद्धापूर्वक नमस्कार करने के बाद ही घर से निकलें। इससे गर्मी का ज्यादा असर नहीं होगा तथा कार्यसिद्धि में मदद मिलती है। होंठों को सुन्दर व कोमल बनाए रखने के लिए रोजाना रात को सोते समय नाभि पर तेल लगाएं। इसी प्रकार जिन्दगी भर बवासीर से बचे रहना चाहें तो रात को सोते समय गुदा में शुद्ध घी लगा लें।
