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हर गली में कुत्ते, हर शाख पर उल्लू, सब तरफ डेरों-तबेलों और भिखारियों का जमघट

Deepak Acharya
Deepak Acharya
October 30, 2025

अपार सौन्दर्य का दिग्दर्शन करा रहा है हमारा अपना शहर

हमारा शहर कई मामलों में निराला है। यहां अनुपम प्राकृतिक एवं परिवेशीय सौन्दर्य के साथ-साथ पग-पग पर मानव निर्मित छोटे-बड़े सौन्दर्य तीर्थ देखने को मिलते हैं।

जो कोई बाहर से आता है वह शहर की सीमाओं में प्रवेश करते ही बहुआयामी जनजीवन की मौलिक झाँकी और ठेठ ग्रामीण व कबीलाई-तबेलाई रहन-सहन एवं बसावट को देखकर अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाता।

शहर में हर तरफ खानाबदोशों के डेरे और तबेले हैं जिन्हें देख कर इतिहास, भूगोल और समाजशास्त्र के विद्यार्थी प्रत्यक्ष ज्ञान का व्यावहारिक अनुभव कर प्रतिभाशाली युवा, मेधावी शोधार्थी और हुनरमन्द सुनागरिक के रूप में अपने आपको पाकर धन्य महसूस करते हैं।

शहर का कोई कोना ऐसा नहीं है जहां बिना किसी स्वीकृति के खूब सारे लोग चाहे जिस तरह अपने रहन-सहन का मौलिक सौन्दर्य दर्शा कर कबीलाई लोक संस्कृति की परम्पराओं के जीवन्त रूप से रूबरू कराते न दिखते हों। अतिक्रमणों का जोर लगातार उछाले मारता रहा है।

इनकी वजह से गन्दगी, अशान्ति और बीमारियों के संक्रमण से लेकर कई सारे परोक्ष एवं प्रत्यक्ष खतरों का सामना करने की स्थितियां भी कई-कई बार सामने आती हैं लेकिन मानवीय संवेदनाओं, दया, करुणा और परोपकार के सागर का ज्वार उमड़ाने वाले हमारे परम संवेदनशील जननायक और पांच साल से लेकर साठ साला बाड़ों के हाकिमों से लेकर तमाम किस्मों के नुमाइन्दे मूकद्रष्टा भाव से अपार पुण्य और अथाह दुआओं का संचय करते हुए अपने आपको धन्य मान रहे हैं।

सार्वजनिक खेल मैदान हो, कोई सा उद्यान हो, सड़कों का किनारा या फुटपाथ, चौराहे और सर्कलों से लेकर जहां कहीं कोई खाली जमीन दिख जाए, वहां यही स्थिति हमारे शहर की सेवा और परोपकार की दिव्य और दैवीय भावनाओं को परिपुष्ट करती नज़र आती है।

साल में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब सरकारी अमला मानवीय और यांत्रिक संसाधन लगाकर कई दिनों की मेहनत के बाद इन्हें साफ करवाता है। टैक्सदाताओं का ईमानदारी और परिश्रम से कमाया खूब सारा धन इसी काम में हर साल लगता रहता है।

और ऐसा कर ये सुशासन के झण्डाबरदार सभी करदाताओं तक यह पुण्य पहुंचाकर उनका इहलोक और परलोक सुधारने में मददगार साबित हो रहे हैं। यह पांच साला और साठ साला बाड़ों के सफेद, काले और मिक्सरंगा हाथियों, हुरातणिया साण्डों और गधों की हम पर महती कृपा का ही प्रतिफल है।

इसके अलावा भिखारियों के डेरों पर जमघट है मंगतों का। और सारे शहर में कोई कोना ऐसा नहीं है जो भिखारियों के सान्निध्य से पावन न हो। इतने सारे भिखारियों का जमावड़ा इस शहर की धर्मप्राण जनता की उदारता और दानशीलता का जीता जागता उदाहरण है। यही सब तो है जो इस शहर को पूरे ब्रह्माण्ड और तीनों लोकों में विलक्षण और अन्यतम स्वरूप प्रदान करता है।

हम कृतज्ञ शहरवासी विनम्रभाव से इन सभी जीवात्माओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए नहीं अघाते। ईश्वर से प्रार्थना है कि इन सभी को एक बार नरक में पदस्थापित कर दे तो नरक की काया ही सुधर जाए, और फिर किसी को नरक के नाम से न भय रहेगा, न दुःख और अवसाद का अहसास।

हमारे सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं को लेकर अतिक्रमणकारियों, कब्जेधारियों से लेकर सरकारी जमीन को किराए पर देकर शहरवासियों की सुख-समृद्धि में चार नहीं चालीस और चार सौ चाँद लगाने वाले विकास पुरुषों और विकास सन्नारियों से लेकर सारे अपराधियों तक में प्रसन्नता व्याप्त है।

इन सभी को धंधा भी मिल रहा है और ऐशो आराम तथा मनमाने-मनचाहे कामों के लिए मुक्ताकाशी धर्मशालाओं जैसा मुफतिया पावन सुख, और सारे संसाधन भी। हराम का सब कुछ मिल ही जाता है।

एक बार प्रेम से भगवान के प्रति आभार ज्ञापित करना न भूलें, जिसने हमें इस परम पावन और विकसित पुण्य धरा पर जन्म लेने का सौभाग्य पूर्ण उपकार किया है और मानवीय प्रतिभाओं के चरमोत्कर्ष का खुली आँखों से दिग्दर्शन करने-कराने का पुण्य प्रदान किया है।

हमारे समकालीन जन्म लेने वाले ये भाग्यविधाता, कर्णधार, सूत्रधार, धार और धाराप्रिय, वजह-बेवजह भौंकने-गुर्राने वाले तमाम देशी-विदेशी किस्मों के श्वान, सुशासनिया चमगादड़, राजकाजी उल्लू और उनके ये पट्ठे न होते तो हमारा जन्म लेना पूरी तरह से बेकार और अर्थहीन ही था।

इन सभी के नित होने वाले पावन दर्शनों, इनकी हरकतों, करामातों और करतूतों से लेकर तमाम प्रकार की फितरतों का ही कमाल है कि हमारा अपना शहर आज हर मामले में आगे ही आगे ही है।

हमारा शहर आगे होना चाहिए, भले ही हम पीछे ही पीछे रहें, चाहे कितने पिछड़ते रहें। इसी में हम खुश हैं। हम शहरवासी मुर्दों की तरह स्थितप्रज्ञ होकर सब कुछ अपनी नंगी आंखों से देखने के आदी हो गए हैं।

हमें न शर्म आती है, न गुस्सा। इन तमाम हालातों को देखकर हम इतने अधिक समाधिस्थ अनुभव कर रहे हैं कि हमें यह तक नहीं सूझ रहा कि इन स्थितियों पर जी भर कर रोएं या हँसें, या कि पास के किसी जलाशय में कूद कर आत्महत्या कर लें या कि आत्मदाह।

खैर हर हाल में खुश रहकर आनन्द का अनुभव करने में हम समूचे ब्रह्माण्ड में सबसे आगे हैं। इस बात का ही सुकून भी है, गर्व और गौरव भी, और यही कारण है कि हम जिन्दा हैं।